बुधवार, 28 जनवरी 2026

इतिहास साक्षी है कि हर नया कानून अपने साथ अवसर के साथ-साथ दुरुपयोग की आशंका भी लेकर आता है — फिजियोथेरेपी पेशे के लिए यह आदेश स्वागतयोग्य है, लेकिन कमजोर नियमन की स्थिति में इसका गलत इस्तेमाल होना न केवल संभव है, बल्कि लगभग तय है

इतिहास साक्षी है कि हर नया कानून अपने साथ अवसर के साथ-साथ दुरुपयोग की आशंका भी लेकर आता है — फिजियोथेरेपी पेशे के लिए यह आदेश स्वागतयोग्य है, लेकिन कमजोर नियमन की स्थिति में इसका गलत इस्तेमाल होना न केवल संभव है, बल्कि लगभग तय है


        केरल उच्च न्यायालय का यह निर्णय कि फिजियोथेरेपिस्ट “डॉ.” उपसर्ग का उपयोग कर सकते हैं और स्वतंत्र रूप से अभ्यास करने के अधिकारी हैं, भारतीय फिजियोथेरेपी पेशे के विकास में एक निर्णायक मोड़ माना जाएगा। लंबे समय से चली आ रही कानूनी अनिश्चितता और पेशेवर पहचान को लेकर जो भ्रम बना हुआ था, इस फैसले ने उस पर स्पष्ट और सशक्त विराम लगाया है। न्यायालय ने यह स्थापित किया है कि फिजियोथेरेपी किसी अन्य चिकित्सा शाखा की सहायक भूमिका नहीं निभाती, बल्कि यह स्वयं में एक सुव्यवस्थित, वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित स्वास्थ्य प्रणाली है, जिसकी अपनी शैक्षणिक संरचना, पेशेवर जिम्मेदारियाँ और नैतिक सीमाएँ हैं।

        यह ऐतिहासिक फैसला फिजियोथेरेपिस्टों के आत्मविश्वास, सामाजिक सम्मान और पेशे की गरिमा को नई मजबूती प्रदान करता है। देश के विभिन्न हिस्सों में कार्यरत योग्य और प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्टों के लिए यह निर्णय न केवल कानूनी सुरक्षा लेकर आया है, बल्कि उनके पेशेवर अस्तित्व को भी औपचारिक मान्यता देता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह निर्णय आने वाले वर्षों में फिजियोथेरेपी को एक स्वतंत्र और जिम्मेदार स्वास्थ्य पेशे के रूप में और अधिक सुदृढ़ करेगा।   

      परन्तु इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी भी क्षेत्र में नया कानून, नया आदेश या नई कानूनी मान्यता दी गई है, तब-तब उसके दो समानांतर प्रभाव देखने को मिले हैं। एक ओर उस पेशे या वर्ग को वैधता, सम्मान और विस्तार का अवसर प्राप्त हुआ है, वहीं दूसरी ओर कमजोर निगरानी, अस्पष्ट नियमों और आधे-अधूरे नियमन के कारण उसी कानून का दुरुपयोग भी शुरू हुआ है। फिजियोथेरेपी पेशे के संदर्भ में आया यह हालिया आदेश भी इसी ऐतिहासिक सत्य का अपवाद नहीं है।

      निस्संदेह, यह आदेश फिजियोथेरेपी को एक स्वतंत्र, वैज्ञानिक और आवश्यक स्वास्थ्य पेशे के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा और स्वागतयोग्य कदम है। वर्षों से फिजियोथेरेपी समुदाय यह मांग करता रहा है कि उसे सहायक या पूरक नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र क्लिनिकल प्रोफेशन के रूप में देखा जाए। इस आदेश ने उस संघर्ष को कानूनी आधार दिया है और यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में फिजियोथेरेपी की भूमिका केवल रिकवरी तक सीमित नहीं, बल्कि दीर्घकालिक कार्यक्षमता, जीवन-गुणवत्ता और पुनर्वास की रीढ़ है।

       लेकिन किसी भी सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है। यही वह बिंदु है जहाँ चिंता जन्म लेती है। भारत जैसे देश में, जहाँ पहले से ही कई स्वास्थ्य पेशों में नकली डिग्रियों, अपूर्ण प्रशिक्षण और व्यावसायिक लालच के उदाहरण मौजूद हैं, वहाँ यदि नियमन मजबूत नहीं हुआ तो यह आदेश फिजियोथेरेपी पेशे के लिए वरदान से अधिक अभिशाप बन सकता है।

     कमजोर रेगुलेशन का सबसे बड़ा खतरा यह है कि फिजियोथेरेपी की पहचान “क्वालिटी-बेस्ड प्रोफेशन” से हटकर “डिग्री-बेस्ड लेबल” बन सकती है। जब स्पष्ट यह तय नहीं होगा कि कौन वास्तविक रूप से प्रशिक्षित फिजियोथेरेपिस्ट है, किस संस्थान की डिग्री मान्य है, कौन-सा पाठ्यक्रम न्यूनतम क्लिनिकल योग्यता प्रदान करता है और किसे स्वतंत्र प्रैक्टिस की अनुमति मिलनी चाहिए, तब इस पेशे में अव्यवस्था फैलना तय है।



      इतिहास हमें बताता है कि जैसे-जैसे किसी पेशे को कानूनी छूट या पहचान मिलती है, वैसे-वैसे उस पेशे में प्रवेश पाने की “शॉर्टकट संस्कृति” भी जन्म लेती है। फिजियोथेरेपी में भी यही खतरा है — नाममात्र के कोर्स, कम अवधि की डिग्रियां, गैर-चिकित्सकीय पृष्ठभूमि वाले संस्थानों द्वारा पाठ्यक्रम शुरू करना और स्वयं को “फिजियोथेरेपिस्ट” घोषित कर देना। इसका सीधा असर न केवल पेशे की साख पर पड़ेगा, बल्कि सबसे अधिक नुकसान मरीजों को होगा।

      एक और गंभीर चिंता यह है कि कमजोर नियमन के चलते फिजियोथेरेपी के नाम पर गैर-वैज्ञानिक उपचार, झूठे दावे और ओवर-कमर्शियलाइजेशन बढ़ सकता है। जब जवाबदेही तय नहीं होती, तब पेशा सेवा से व्यापार बन जाता है। ऐसे में ईमानदार, प्रशिक्षित और नैतिक फिजियोथेरेपिस्ट उसी व्यवस्था में संघर्ष करने को मजबूर हो जाते हैं, जिसे उन्हें सशक्त करना था।

        यह भी समझना जरूरी है कि कानून अपने आप में समाधान नहीं होता, बल्कि कानून का क्रियान्वयन ही उसकी असली परीक्षा होती है। यदि इस आदेश के साथ-साथ एक सशक्त, पारदर्शी और कठोर रेगुलेटरी फ्रेमवर्क विकसित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यही आदेश कानूनी भ्रम, पेशेवर टकराव और नैतिक गिरावट का कारण बन सकता है।

       फिजियोथेरेपी जैसे विज्ञान-आधारित पेशे के लिए यह अनिवार्य है कि शिक्षा, पंजीकरण, क्लिनिकल प्रैक्टिस, पेशेवर आचरण और सतत शिक्षा (Continuing Professional Development) — इन सभी पर स्पष्ट और कठोर नियम लागू हों। बिना इसके, कानूनी मान्यता केवल कागज़ी जीत बनकर रह जाएगी।


अंततः, यह आदेश अच्छा है, आवश्यक है और समय की मांग भी है। लेकिन इतिहास हमें चेतावनी देता है कि यदि नियमन कमजोर रहा, निगरानी ढीली रही और गुणवत्ता से अधिक संख्या को प्राथमिकता दी गई, तो इसका दुरुपयोग न केवल संभव है, बल्कि लगभग तय है। इसलिए अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी नीति-निर्माताओं, रेगुलेटरी बॉडीज़ और स्वयं फिजियोथेरेपी समुदाय पर है कि वे इस आदेश को अवसर बनाएं, चेतावनी नहीं।

क्योंकि कोई भी कानून तब तक सफल नहीं माना जा सकता, जब तक वह पेशे की गरिमा बढ़ाए, मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करे और समाज के हित में ईमानदारी से लागू हो।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें