शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

फिजियोथेरेपी को कानूनी मान्यता: उपलब्धि, उत्साह और उससे जुड़ी सबसे बड़ी विडंबना

फिजियोथेरेपी को कानूनी मान्यता: उपलब्धि, उत्साह और उससे जुड़ी सबसे बड़ी विडंबना


     केरल उच्च न्यायालय द्वारा फिजियोथेरेपिस्टों को “डॉ.” उपसर्ग के उपयोग और स्वतंत्र अभ्यास के अधिकार को मान्यता दिया जाना निस्संदेह भारतीय फिजियोथेरेपी इतिहास का एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण है। यह निर्णय वर्षों से चले आ रहे पेशेवर असमंजस, कानूनी अस्पष्टता और पहचान के संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में एक मजबूत कदम है। इस फैसले ने यह स्पष्ट किया है कि फिजियोथेरेपी कोई सहायक या उप-पेशा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक, साक्ष्य-आधारित, स्वायत्त और जिम्मेदार स्वास्थ्य पेशा है, जिसकी अपनी शिक्षा प्रणाली, नैतिक संहिता और पेशेवर सीमाएँ हैं।


       यह निर्णय फिजियोथेरेपिस्टों के आत्मसम्मान, सामाजिक पहचान और पेशेवर गरिमा को सुदृढ़ करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इससे देशभर में कार्यरत लाखों योग्य फिजियोथेरेपिस्टों को मानसिक और पेशेवर संबल मिला है। लेकिन इतिहास गवाह है कि हर बड़ी उपलब्धि के साथ एक बड़ा खतरा भी जुड़ा होता है—और यही वह बिंदु है जहाँ अत्यधिक उत्साह, और व्यावसायिक सोच इस ऐतिहासिक उपलब्धि को कमजोर कर सकती है।

     साथ ही केरल हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘डॉक्टर’ शब्द किसी एक पेशे, विशेषकर केवल मेडिकल प्रोफेशन, का एकाधिकार नहीं है और एनएमसी कानून में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो इस शब्द को केवल एमबीबीएस डॉक्टरों तक सीमित करे। अदालत ने फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट द्वारा नाम के आगे ‘डॉ.’ लगाने पर की गई आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि उच्च शैक्षणिक योग्यता रखने वाले लोग, जैसे पीएचडी डिग्रीधारक, ‘डॉक्टर’ उपाधि का उपयोग कर सकते हैं।



       कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मानना गलत है कि ‘डॉक्टर’ शब्द केवल मेडिकल प्रोफेशनल्स का अधिकार है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से यह उपाधि उन लोगों के लिए प्रयुक्त होती रही है जिन्होंने किसी विषय में उच्चतम स्तर की शिक्षा प्राप्त की हो और जिन्हें पढ़ाने या पेशेवर रूप से कार्य करने का लाइसेंस मिला हो।


खुशी से उन्माद तक: जब उत्सव विवेक खो देता है


     हाल के दिनों में यह देखने को मिल रहा है कि इस फैसले के बाद कुछ वर्गों में यह विचार तेजी से फैलाया जा रहा है कि अब सभी non-medical private universities को अपने प्रत्येक बैच में BPT की सीटें सैकड़ों या हजारों की संख्या में बढ़ा देनी चाहिए। यहाँ तक कहा जा रहा है कि “2030 तक हर घर में फिजियोथेरेपी डॉक्टर होना चाहिए।” सुनने में यह नारा आकर्षक, भावनात्मक और गर्व से भरा प्रतीत होता है, लेकिन यदि इसे गहराई से देखा जाए तो यह न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि स्वास्थ्य शिक्षा और पेशे दोनों के लिए अत्यंत खतरनाक भी है।

     क्या स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक जरूरत इस बात से तय होती है कि कितने घरों में डॉक्टर हैं, या इस बात से कि कितने मरीजों को सही समय पर, सही गुणवत्ता की और नैतिक चिकित्सा मिल रही है? क्या किसी पेशे की मजबूती उसकी संख्या से मापी जाती है, या उसकी गुणवत्ता, कौशल और सामाजिक उपयोगिता से?


स्वास्थ्य शिक्षा कोई फैक्ट्री नहीं है:-


     स्वास्थ्य शिक्षा कोई ऐसी फैक्ट्री नहीं है जहाँ कच्चा माल (छात्र) डालकर, बिना गुणवत्ता नियंत्रण के, बड़ी संख्या में तैयार उत्पाद (डिग्रीधारी) निकाल दिए जाएँ। फिजियोथेरेपी जैसी क्लिनिकल साइंस में शिक्षा का अर्थ है—वर्षों का गहन प्रशिक्षण, अनुभवी फैकल्टी का मार्गदर्शन, पर्याप्त मरीजों पर supervised clinical exposure, आधुनिक उपकरण, इंटरडिसिप्लिनरी कोऑर्डिनेशन और सबसे महत्वपूर्ण—पेशेवर नैतिकता।

     यदि बिना पर्याप्त फैकल्टी, अस्पताल अटैचमेंट, OPD/IPD लोड, रिसर्च कल्चर और रेगुलेटरी निगरानी के हजारों सीटें बढ़ा दी जाएँगी, तो परिणाम केवल एक होगा—अर्ध-प्रशिक्षित, भ्रमित और असुरक्षित पेशेवरों की भीड़। ऐसी भीड़ न तो मरीजों को लाभ पहुँचा सकती है और न ही पेशे की साख को बचा सकती है।


संख्या का नशा और गुणवत्ता की हत्या:-


      इतिहास हमें बार-बार चेतावनी देता है कि जब भी किसी पेशे में “संख्या बढ़ाओ” की नीति बिना “गुणवत्ता सुनिश्चित करो” के लागू की गई है, तब-तब उस पेशे की सामाजिक प्रतिष्ठा गिरती गई है। आज यदि हर साल हजारों BPT और MPT डिग्रीधारी निकलेंगे, लेकिन उनके लिए न तो पर्याप्त नौकरियाँ होंगी, न उचित वेतन, और न ही सुरक्षित प्रैक्टिस वातावरण, तो परिणामस्वरूप बेरोज़गारी, फीस-डंपिंग, पेशे के भीतर आपसी संघर्ष और नैतिक समझौते बढ़ेंगे।

     आज जो छात्र बड़े सपनों के साथ फिजियोथेरेपी में प्रवेश कर रहा है, वही छात्र कुछ वर्षों बाद हताश, आर्थिक रूप से असुरक्षित और पेशे से मोहभंग का शिकार हो सकता है। यह स्थिति किसी भी स्वस्थ स्वास्थ्य प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं है।


“हर घर में डॉक्टर” बनाम “हर मरीज तक सही डॉक्टर”:-


       “2030 तक हर घर में फिजियोथेरेपी डॉक्टर” का नारा जितना लोकप्रिय है, उतना ही भ्रामक भी। वास्तविक लक्ष्य यह होना चाहिए कि हर मरीज तक समय पर, प्रशिक्षित और सक्षम फिजियोथेरेपिस्ट पहुँचे—चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र हो, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हो, जिला अस्पताल हो या पुनर्वास संस्थान।

     भारत जैसे देश में समस्या डॉक्टरों की संख्या की नहीं, बल्कि उनके समान वितरण, उचित उपयोग और सिस्टम में एकीकरण की है। शहरों में डॉक्टरों की भीड़ और गाँवों में सेवाओं की कमी—यह असंतुलन सीटें बढ़ाने से नहीं, बल्कि नीति, नियोजन और सिस्टम सुधार से ठीक होगा।


पेशे की स्वतंत्रता का अर्थ जिम्मेदारी भी है:-


     न्यायालय द्वारा दी गई स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि पेशा अब किसी भी दिशा में बिना नियंत्रण के बढ़े। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है—शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी, मरीजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी और समाज के विश्वास को बनाए रखने की जिम्मेदारी।

    यदि आज हम केवल “डॉ.” लिखने के अधिकार पर गर्व करें, लेकिन उस “डॉ.” के पीछे खड़े ज्ञान, कौशल और नैतिकता को कमजोर कर दें, तो यह अधिकार जल्द ही अपने ही बोझ तले दब जाएगा।


आगे का रास्ता: उत्साह नहीं, संतुलन:-


       फिजियोथेरेपी के भविष्य के लिए सबसे जरूरी है—नियोजित विस्तार, सख्त मानक, पारदर्शी रेगुलेशन और वास्तविक जरूरतों पर आधारित सीट निर्धारण। सरकार, नियामक निकाय, विश्वविद्यालय, पेशेवर संगठन और वरिष्ठ फिजियोथेरेपिस्ट—सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि यह ऐतिहासिक निर्णय संख्या की दौड़ में नहीं, बल्कि गुणवत्ता की ऊँचाई में बदले।


निष्कर्ष: इतिहास अवसर देता है, चेतावनी भी:-


     केरल हाईकोर्ट का यह फैसला फिजियोथेरेपी पेशे के लिए एक स्वर्णिम अवसर है, लेकिन साथ ही एक मौन चेतावनी भी है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे पेशे की मजबूती, गरिमा और सामाजिक उपयोगिता बढ़ाने का माध्यम बनाते हैं या इसे शिक्षा के बाज़ारीकरण और पेशे के पतन का कारण।

     यदि आज हमने विवेक, संतुलन और दीर्घकालिक सोच को प्राथमिकता नहीं दी, तो संभव है कि आने वाले वर्षों में यही ऐतिहासिक निर्णय, हमारे लिए सबसे बड़ी विडंबना बनकर खड़ा हो—जहाँ डॉक्टर तो बहुत होंगे, लेकिन सम्मान, रोजगार और संतोष दुर्लभ हो जाएगा।

यही असली प्रश्न है—
हमें डॉक्टरों की भीड़ चाहिए, या एक मजबूत और सम्मानित फिजियोथेरेपी पेशा?

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