🩺 रिहैबिलिटेशन में मतभेद या मनभेद? Surgeon और Physiotherapist के बीच बढ़ती दूरी
चिकित्सा जगत में "Rehabilitation" सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह वह संवेदनशील पुल है जो बीमारी और पूर्ण स्वस्थ जीवन के बीच जुड़ता है। परंतु आज इस पुल के दोनों छोर — Orthopedic Surgeon और Physiotherapist — के बीच एक बढ़ती हुई दरार दिखाई देती है। यह दरार सिर्फ सोच की नहीं, बल्कि "मानसिक व व्यावहारिक" दृष्टिकोण की भी है। सवाल यह नहीं कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि — मरीज के हित में हम एक-दूसरे को कितना समझते हैं।
🔹 मतभेद की जड़ कहाँ से शुरू होती है?
कई दशकों पहले तक Physiotherapy को केवल “सहायक उपचार” के रूप में देखा जाता था। Orthopedic Surgeon surgery या diagnosis के बाद recovery की जिम्मेदारी Physiotherapist को सौंपते थे। लेकिन समय के साथ Physiotherapy एक स्वतंत्र, scientifically evidence-based profession बन गई — जहाँ मूल्यांकन (Assessment), योजना (Treatment Planning), और पुनर्वास (Rehabilitation) पूरी तरह विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है।
यहीं से मतभेद की शुरुआत हुई —
▫️कुछ Surgeons अब भी Physiotherapist को “Technician” मानते हैं।
▫️वहीं कई Physiotherapists Surgeons के “Clinical Authority” को चुनौती देने लगे हैं।
▫️परिणामस्वरूप सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा की भावना जन्म लेने लगी है।
🔹 असली कारण — मनभेद की मानसिकता:
मतभेद (Difference of Opinion) तो स्वाभाविक है, परंतु मनभेद (Difference of Respect) तब खतरनाक बनता है जब “Ego” बीच में आ जाता है।
आज कई जगहों पर देखा गया है कि —
▫️Surgeon केवल surgical correction को ही अंतिम समाधान मानते हैं।
▫️जबकि Physiotherapist शरीर की functional recovery को असली इलाज समझते हैं।
यह दृष्टिकोण का टकराव नहीं, बल्कि रोगी-केंद्रित सोच की कमी है। क्योंकि असल में दोनों की भूमिका एक ही लक्ष्य के लिए है —
“मरीज की बेहतर Quality of Life”
🔹 मरीज पर इसका प्रभाव:
जब Surgeon और Physiotherapist के बीच तालमेल नहीं होता, तो उसका सीधा नुकसान मरीज को होता है⚠️
1. Rehabilitation में Delay होता है।
2. Confusion पैदा होता है — मरीज समझ नहीं पाता किसकी बात माने।
3. Incomplete Recovery की संभावना बढ़ जाती है।
4. और कई बार मरीज का भरोसा दोनों प्रोफेशन पर से उठ जाता है।
मरीज के लिए सबसे बड़ी तकलीफ तब होती है जब दो विशेषज्ञ, जिन पर वह भरोसा करता है, एक-दूसरे की राय पर शक करते हैं।
🔹 Professional Ego — सबसे बड़ा रोग:
Rehabilitation की सबसे बड़ी विफलता “Ego” है।
जब कोई Surgeon कहता है —
“Physiotherapy तो surgery के बाद की औपचारिकता है”
या Physiotherapist कहता है —
“Surgeon तो patient को बिना movement के छोड़ देते हैं”
तो असल में दोनों ही मरीज की Recovery को नुकसान पहुँचा रहे होते हैं।
यह “Ego” केवल पेशेवर नहीं, बल्कि मानवता की दृष्टि से भी दुर्भाग्यपूर्ण है। क्योंकि चिकित्सा पेशा, सेवा और सहयोग की नींव पर टिका है।
🔹 समाधान की दिशा:
यह दरार भरने का एक ही तरीका है — आपसी सम्मान और संवाद:
1. Joint Clinical Meetings: Surgeon और Physiotherapist को एक साथ बैठकर मरीज की योजना बनानी चाहिए।
2. Mutual Acknowledgment: एक-दूसरे की विशेषज्ञता को खुले मन से स्वीकार करना चाहिए।
3. Integrated Rehabilitation Units: जहाँ assessment से लेकर discharge तक multidisciplinary टीम काम करे।
4. Public Awareness: मरीजों को यह बताया जाए कि Surgeon और Physiotherapist एक ही टीम के सदस्य हैं, विरोधी नहीं।
5. Education Curriculum में Integration: Medical और Physiotherapy छात्रों को एक साथ patient management के modules पढ़ाए जाएँ, ताकि भविष्य में तालमेल बने।
🔹 असली सवाल ❔
❔क्या हम Rehabilitation को एक Team Effort मानते हैं या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का युद्ध?
❔क्योंकि जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक मरीज Recovery नहीं बल्कि “Referral Confusion” झेलेगा।
🔹 निष्कर्ष:
Rehabilitation कोई “Ownership” नहीं है — यह एक Shared Responsibility है—
“Orthopedic Surgeon शरीर की संरचना को सही करता है”
“Physiotherapist उसकी कार्यक्षमता को पुनर्जीवित करता है”
दोनों साथ मिलकर ही मानव जीवन को उसकी मूल गतिशीलता लौटा सकते हैं।
इसलिए आज सबसे ज़रूरी है कि दोनों अपने बीच की दूरी को मिटाएँ,
मतभेदों को संवाद में बदलें, और मनभेदों को मानवता से हराएँ।
क्योंकि अंततः —
“जब Ego हारती है, तब मरीज जीतता है”
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