बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

Physiotherapy को लेकर मरीज की गलत धारणाएँ

“Physiotherapy को लेकर मरीज की गलत धारणाएँ”

      आज भी हमारे समाज में Physiotherapy को लेकर कई गलतफहमियाँ गहराई तक जमी हुई हैं। बहुत से मरीज इसे “exercise” या “मालिश” का दूसरा नाम समझते हैं, जबकि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। Physiotherapy एक scientific, evidence-based medical branch है, जिसका मकसद केवल दर्द कम करना नहीं, बल्कि दर्द के मूल कारण को पहचानकर उसे ठीक करना होता है। लेकिन इन वैज्ञानिक तथ्यों के बावजूद, मरीजों के मन में कुछ ऐसी धारणाएँ बैठी होती हैं जो उन्हें सही इलाज तक पहुँचने से रोकती हैं।

पहली और सबसे बड़ी धारणा यह है कि “Physiotherapy से असर धीरे होता है।”
      मरीज अक्सर यह सोचता है कि जब दवा खाकर या injection लगवाकर दर्द कुछ ही घंटों में कम हो सकता है, तो Physiotherapy करने की क्या ज़रूरत है? लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आता कि दवा दर्द को दबाती है, जड़ को नहीं मिटाती — जबकि Physiotherapy शरीर के dysfunction को ठीक करके स्थायी राहत देती है। यह प्रक्रिया धीरे लगती है, लेकिन इसके परिणाम लंबे समय तक बने रहते हैं।

दूसरी गलत धारणा यह है कि “Physiotherapy सिर्फ हल्की चोट या छोटे दर्द के लिए होती है।”
     वास्तव में, Physiotherapy का दायरा बहुत व्यापक है। यह सिर्फ मांसपेशियों या जोड़ों के दर्द तक सीमित नहीं — बल्कि neurological disorders, post-surgery rehabilitation, paralysis recovery, cardiac conditions और respiratory therapy तक फैला हुआ है। यानी, यह preventive, curative और rehabilitative तीनों भूमिकाएँ निभाती है।

तीसरी भ्रांति यह है कि “Physiotherapy घर पर कुछ exercises करने से हो जाती है।”
        कई मरीज YouTube या किसी जानकार की सलाह से general exercises करने लगते हैं। इससे कभी-कभी आराम की बजाय नुकसान हो जाता है। असल में, Physiotherapy एक customized treatment है — हर मरीज की समस्या, शरीर की बनावट, muscle strength, posture और pain pattern अलग होता है। इसलिए बिना assessment के exercise करना वैसा ही है जैसे किसी दूसरे की दवा खा लेना।

चौथी धारणा यह भी है कि “Physiotherapy डॉक्टर की सलाह के बिना करवाने लायक नहीं है।”
       बहुत से मरीज सोचते हैं कि जब तक Orthopedic या Neurologist Physiotherapy के लिए न कहे, तब तक इसका कोई मतलब नहीं। लेकिन आज के समय में Physiotherapists first contact practitioners हैं — यानी वे खुद assessment कर सकते हैं, diagnosis बना सकते हैं और scientific treatment शुरू कर सकते हैं। यह विश्वास तभी बनेगा जब मरीज Physiotherapy को “supportive” नहीं, बल्कि “independent treatment system” के रूप में देखना शुरू करेंगे।

पाँचवीं और बहुत सामान्य धारणा यह है कि “Physiotherapy सिर्फ बुज़ुर्गों या chronic patients के लिए है।”
        जबकि सच्चाई यह है कि Physiotherapy हर उम्र के व्यक्ति के लिए ज़रूरी है — चाहे वह sportsperson हो, office worker हो, या किसी दुर्घटना के बाद rehabilitation की ज़रूरत हो। आजकल sedentary lifestyle के कारण युवा वर्ग में भी posture-related pain और muscular imbalance बहुत आम हो गया है, जिसे Physiotherapy ही सुधार सकती है।

छठी गलतफहमी यह है कि “Physiotherapy का असर स्थायी नहीं होता।”
        असल में, जो मरीज prescribed sessions पूरे नहीं करते या follow-up exercises जारी नहीं रखते, वे ही यह अनुभव करते हैं कि दर्द वापस आ गया। Physiotherapy की effectiveness consistency पर निर्भर करती है। यह शरीर को दुबारा imbalance में जाने से रोकती है — लेकिन अगर मरीज discipline न रखे, तो कोई भी इलाज स्थायी नहीं हो सकता।

👉 सच्चाई यह है:
      Physiotherapy केवल treatment नहीं, बल्कि शरीर की recovery science है। यह आपकी दवाओं पर निर्भरता घटाती है, surgery की जरूरत को टाल सकती है, और शरीर की natural healing को सक्रिय करती है।

      इसलिए, जब भी मरीज यह सोचता है कि “Physiotherapy से क्या फर्क पड़ेगा,” तब असल में फर्क उसकी सोच में पड़ना चाहिए। क्योंकि Physiotherapy कम असरकारक नहीं, बल्कि सबसे वैज्ञानिक, सुरक्षित और दीर्घकालिक उपचार पद्धति है — बशर्ते मरीज उसे समझे, सम्मान दे और पूरा कोर्स धैर्य से पूरा करे।

निष्कर्ष:
      गलत धारणाएँ तभी टूटेंगी जब मरीज Physiotherapy को exercise नहीं, बल्कि medical science की वह शाखा माने जो बिना दवा और बिना सर्जरी शरीर को उसकी असली कार्यक्षमता वापस दिलाने की शक्ति रखती है।

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