Tuesday, November 13, 2018

फिजियोथेरेपी के अंतर्गत डायाथर्मी चिकित्सा पद्दति और इसके लाभ


      डायाथर्मी एक विद्युत चिकित्सा है जिसमें विद्युत धारा प्रवाह के माध्यम से ऊष्मा उत्पन्न की जाती है । डायाथर्मी चिकित्सा में एक उच्च आवृत्ति विद्युत प्रवाह शार्टवेव , माइक्रोवेव और अल्ट्रासाउण्ड के माध्यम से वितरित किया जाता है जिससे शरीर ऊतकों में गर्मी पैदा की जाती है , रक्त प्रवाह को बढ़ाने और दर्द को दूर करने के लिए इस गर्मी का इस्तेमाल किया जा सकता है । बन्द रक्त वाहिकाओं को खोलने और असामान्य कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए सर्जिकल उपकरण के रूप में डायाथर्मी चिकित्सा का उपयोग किया जाता है । एक उच्च विद्युतीय व चुम्बकीय धाराओं के रूप में शरीर चिकित्सा के उपयोग डायाथर्मी चिकित्सा लायी जाती है । इसका उपयोग शल्य चिकित्सा में डायाथर्मी के द्वारा सूजन को कम करने और संक्रमित ऊतकों को नष्ट करने और अत्यधिक रक्तस्राव को रोकने के लिए उपयोग में लाया जाता है । न्यूरोसर्जरी के द्वारा आँखों की सर्जरी में भी विशेष रूप से डायाथर्मी चिकित्सा का उपयोग किया जाता है । 

डायाथर्मी के प्रकार :
डायाथर्मी के तीन प्रकार हैं जो शारीरिक व्यावसायिक चिकित्सक द्वारा प्रयोग में लाए जाते हैं-
( 1 ) अल्ट्रासाउण्ड , ( 2 ) शार्ट वेव , ( 3 ) माइक्रोवेव 

( 1 ) अल्ट्रासाउण्ड डायाथर्मी- उच्च आकृति ध्वनि कम्पन चिकित्सा अल्ट्रासाउण्ड डायाथर्मी है , जो ऊतकों के माध्यम से गर्मी में परिवर्तित होकर कार्य करती है । जिस भाग का इलाज करना है , यह यन्त्र उस सतह पर धीरे - धीरे चलता है । अल्ट्रासाउण्ड थैरेपी के द्वारा जिस भाग का उपचार करना है , वहाँ पर ऊष्मा पैदा करने के लिए और उस भाग को ठीक करने के लिए सबसे प्रभावी उपचार है । परन्तु इस चिकित्सा को भौतिक चिकित्सक के बिना उपयोग नहीं किया जाता है और भौतिक चिकित्सक पूर्ण रूप से प्रशिक्षित और ज्ञानी होना चाहिए जिससे कि कोई खतरा या दुर्घटना की सम्भावना न के बराबर हो ।
( 2 ) शार्टवेव या अल्प तरंग डायाथर्मी — अल्प तरंग डायाथर्मी चिकित्सा एक उच्च आकृति विद्युत धारा है , जो गहरे या अन्दर के ऊतकों को ऊष्मा देते हैं अर्थात् अल्प तरंग डायाथर्मी ऊष्मा में एक ऐसा विकिरण है जिससे उच्च आकृति विद्युत धारा द्वारा अधिक गहराई में स्थित ऊतकों को ऊष्मा प्रदान की जाती है । इस विधि में विद्युत धारा बिना ज्वलनशील प्रक्रिया के गहरे ऊतकों में ऊष्मा व गर्मी के रूप में परिवर्तित हो जाती है । इसकी आकृति लगभग 27 : 35 MHz होती है । यह अपना कार्य दो परिपथ में करती है 1 . मशीन परिपथ , 2 . रोगी परिपथ ।
1. मशीन परिपथ – इस परिपथ में कन्डेन्स और एक कम ओह्न प्रतिरोधक के विद्युत प्रेरक होते हैं तथा धारा की आकृति बड़ी होती है । कन्डेन्सर को बार - बार परिवर्तित किया जा सकता है परन्तु धारा प्रतिरोधक पदार्थ डापोल्स की स्थिति को नहीं बदलते हैं और यह आण्विक दूरी इनकी विद्युत प्रतिरोधक पदार्थ बनाती है । 
2 . रोगी परिपथ – रोगी के ऊतकों के लिए इलेक्ट्रोड और कैपिसीटर का उपयोग करते हैं । इसकी क्षमता इलेक्ट्रोड के साइज और इनके मध्य पदार्थ और दूरी पर निर्भर करता है । विभिन्न क्षमता वाले कन्डेन्सरों को समायोजित किया जाता है इसलिए रोगी के परिपथ में अधिकतम शक्ति हो जाती है । शरीर कार्यकीय प्रभाव 1 / मिलियन / सेकण्ड आवेगों को 0 - 001 मिलियन / सेकण्ड समय काल के साथ उत्पन्न किया जाता है । इसमें धारा के एकान्तर क्रम में आने वाले आवेग तन्त्रिका तन्तुओं को उत्तेजित नहीं करते हैं और न ऊतकों में जलन होने देते हैं । अतः रोगी के ऊतकों में बिना किसी हानिकारक प्रभाव से इस धारा को उच्च तीव्रता से गुजारा जा सकता है । 

शार्टवेव डायाथर्मी का उपयोग व तकनीक-  कई प्रकार के इलेक्ट्रोड के प्रकारों के द्वारा ऊष्मा उत्पन्न करके चोट की स्थिति के अनुसार शार्टवेव डायथर्मी का उपयोग किया जाता है । जिस - जिस इलेक्ट्रोड का उपयोग शाटेवेव डायाथर्मी में किया जाता है , वह निम्न है , जैसे-
1 . मेन्स शी इलेक्ट्रोड – गायनोलोजिकल समस्याओं के लिए उपयोग में लाया जाता 
2 . कोप्लेनर — पैरों से समकोण आकृति द्वारा शरीर के आवश्यक भाग से इलेक्ट्रोडों के मध्य रखने पर आप्टीमम ऊष्मा मिलती है । 
3 . क्रॉस फायर विधि — इस विधि का उपयोग कुछ घटनाओं से किया जाता है , लेकिन इसमें सावधानी रखने वाली बात यह है कि मरीज आँखों में चश्मा न लगाते हों । आवश्यकतानुसार दोहरी डायाथमी को भी उपयोग में लाया जा सकता है । उदाहरण के लिए महिलाओं के पेल्विक भाग का इलाज करने के लिए।
4. केबल विधि — इसमें चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ दोनों इलेक्ट्रोडों से लेते हैं , अन्त में स्थिर विद्युत क्षेत्र को ऊष्मा से सीधे उपयोग किया जाता है जबकि इलेक्ट्रो - मैग्नेटिक फील्ड गहराई तक ऊष्मा देने में लाभदायक होती है । इसमें केबल की लम्बाई लगभग 5 मीटर तक रखते हैं । 
5.आवश्यकतानुसार- आवश्यकता व आकार के अनुसार अन्य प्रकार के इलेक्ट्रोड को समायोजित कर सकते हैं , इन्हें मेटल प्लेट इलेक्ट्रोड भी कहते हैं। यह निम्न जगह पर होती है - 1 . कन्धे की सूजन , 2 . कोहनी संयुक्त की सूजन , 3 . गर्दन के जोड़ों के अध : पतन में , 4 . घुटने और कूल्हे के जोड़ों का अपकर्ष , 5 . संयुक्त घुटने में मोच बन्धन , 6 , निचले भाग की पीठ दर्द , 7 . एड़ी का दर्द , 8 . साइनसाइटिस । 
अन्य उपयोग - 1 . रक्तस्राव , 2 . अल्सर , 3 . हीमोफिलिया , 4 . थ्रोम्बोसिस , 5 . ट्यूमर , 6 . गर्भावस्था , 7 . शिराओं में सूजन , 8 . मासिक धर्म में अतिव्यय , 9 . यूबरोक्लोसिस , 10 . पेरीफेरल वेस्कुलर रोग । 
चोट के अनुसार उपर्युक्त इलेक्ट्रोड के प्रसार और अन्य जगहों के प्रकार में ऊष्मा में विभिन्न एवं उपकरण आदि का उपयोग किया जाता है । मरीज को उपयोग में की जाने वाली विधि की जानकारी पहले ही दे देनी चाहिए । इसमें उपकरण की तीव्रता को उस समय तक बढाते हैं, जब तक मरीज को चोटग्रस्त भाग पर गर्मी या ऊष्मा महसूस न होने लगे । गहरे ऊतकों तक ऊष्मा प्रवाह के लिए चोटग्रस्त भाग के दोनों ओर इलेक्ट्रोडों को रखना चाहिए इसमें धारा घनत्व चोट सतह पर अधिक होता है । आण्विक विनाश द्वारा ऊतकों में ऊष्मा उत्पादन होता है । इसके लिए अधिकतर केबल तकनीक या कन्डेन्सर फील्ड का उपयोग करते । कन्डेन्सर फील्ड से विद्युत स्थित क्षेत्र उत्पन्न होता है । विद्युत स्थित क्षेत्र एवं चम्बकीय क्षेत्र केबल से उत्पन्न होता है । इस चिकित्सा को एक दिन छोड़कर देते हैं जिसका निर्धारित समय 20 से 30 मिनट का होता है । यह चिकित्सा तीव्र सूजन आदि लिए 5 से 10 मिनट तक दिन में दो बार दी जाती है ।
( 3 ) माइक्रोवेव डायाथर्मी या सूक्ष्म तरंग डायाथर्मी रेडियो तरंगों की आकृति में उच्च और तरंगदैर्ध्य में कम करके उपयोग में माइक्रोवेव डायाथमी लायी जाती है । माइक्रोवेव में रडार के उपयोग से 300 MHz और तरंगदैर्घ्य के कम - से - कम मीटर की आकृति होती विद्युत - चुम्बकीय वर्णक की तरंग लम्बाई वाली सूक्ष्म तरंगों को प्रयोग इस डायाथर्मी की विधि में लाते हैं । डेसीमीटर तरंगों के रूप में इन सूक्ष्म तरंगों को जाना जाता है । इन तरंगों की तरंग लम्बाई 12 . 25 सेमी तथा आकृति 2400 मेगा चक्र / सेकण्ड ( MHz ) होती है । इनका उपयोग सीधा करते हैं । इन्हें मोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती है , क्योंकि इसके सर्किट के पास व्यक्ति नहीं होता है । इन किरणों को ग्रहण करने वाले वृत्तीय या समकोणीय रह सकता यह वत्तीय तरीके से स्थित है , तो इनके प्रभाव की मात्रा एक तरफ होगी यदि समकोणीय है तो इन किरणों का प्रभाव केन्द्र में अधिक होगा । इन तरंगों से इलाज कराने वाला व्यक्ति 10 से 20 सेमी दूरी पर रहता है । यदि इलाज कराने वाला व्यक्ति उत्तल है किरणे अधिक गहराई तक भेदन करेंगी । वैसे इस सूक्ष्म डायाथर्मी की भेदना गहराई 3 सेमी तक होती है । इसे उपयोग करने का समय 10 / 30 मिनट / दिन होता है तथा धारा प्रवाह 200 वाट किया जाता है । अधिक गहरे ऊतकों के ऊष्मा को विद्युत चुम्बकीय विकिरण इस सूक्ष्म तरंग डायाथर्मी परिवर्तित प्रक्रिया द्वारा उपयोग किया जाता है । वे ऊतक जिनमें पानी की मात्रा अधिक है , इन किरणों को अवशोषित कर लेती है , लेकिन हड्डियों में पानी की कमी होने से देरी से अवशोषित करती है । ऊतकों में 900 MHz से अच्छा भेदन होता है । 2500 MHz से केवल ऊष्मा अपत्वचीय ऊतकों में की जा सकती है । इसके द्वारा ऊतकों से उत्पन्न ऊष्मा विकिरण द्वारा अवशोषण के बाद ऊतकों में संचालित होती है । ऊतकों के घाव भरने में यह डायाथर्मी वेस्कुलर अधिक सहायक है । इसका उपयोग माँसपेशी में किया जाता है । माँसपेशीय चोटों के लिए यह डायाथर्मी अधिक प्रभावशाली और लाभकारी । रक्त परिसंचरण को बनाने में भी यह सहायक होती है । 
माइक्रोवेव तकनीक- माइक्रोवेव डायाथर्मी में रोगी उपकरण के पास चोटग्रस्त भाग को लाकर कुछ देर तक इन्तजार करते हैं । चोटग्रस्त भाग की गति इस ( इलाज ) के दौरान नहीं करनी चाहिए । तीव्र स्थिति में किरणों को कम मात्रा में देना चाहिए । 

माइक्रोवेव डायाथर्मी उपचार का प्रभाव – एक विद्युत प्रवाह का उपयोग माइक्रोवेव डायाथर्मी करती है । इसका उपयोग किसी भी गहरे ऊतकों के अन्दर ऊष्मा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है । यह त्वचा की सतह से दो इंच गहरे भाग तक ही पहुँचा सकती है । डायाथर्मी मशीन तकनीक लगभग शरीर के लिए सीधे लागू नहीं होती । इसके बजाय वर्तमान शरीर को मशीन द्वारा निशाना बनाया जा सकता है इसके अतिरिक्त कई अन्य कारण हैं जिसको इसमें एडिट करना चाहिए-
( 1 ) ये किरणें जल द्वारा शीघ्रता से अवशोषित कर ली जाती हैं । अत : माँसपेशी चोटों के लिए यह उपचार अधिक लाभकारी है । अतः यह वसा को कम ऊष्मा प्रदान करता है और माँसपेशियों को अधिक ऊष्मा प्रदान करता है । 
( 2 ) माँसपेशी ऐंठन को कम करती है । 
( 3 ) रक्त परिसंचरण को बढ़ाती है । 
( 4 ) तन्त्रिका तन्तु नर्व एडिंग में दर्द बढ़ाता है । 
( 5 ) आँखों के लिए बहुत हानिकारक है । 
( 6 ) बैक्टीरिया संक्रमण से बचाती है । 
( 7 ) ट्रामेटिक और रेहमेटिक परिस्थितियों में अधिक दर्द होता है । इसका इलाज अच्छी तरह व प्रभावी ढंग से किया जाता है ।
सावधानियाँ – 
( 1 ) इसका उपयोग बढ़ती हुई हड्डी के पास नहीं करना चाहिए । 
( 2 ) तापीय संवेदना की क्षति अधिक क्षेत्र में होती है । 
( 3 ) इसका उपयोग आँखों के पास नहीं करना चाहिए । 
( 4 ) इसका उपयोग गोनाड ( Gonad ) के पास नहीं करना चाहिए । 
( 5 ) इसका उपयोग रक्तस्राव में नहीं करना चाहिए । 
( 6 ) इस उपचार को करते समय आँखों का विशेष ध्यान रखना चाहिए । 
( 7 ) इसका उपचार त्वचा की सही जाँच हो जाने के बाद ही करना चाहिए ।

सामान्य सावधानियाँ और जहाँ इसका उपयोग नहीं करना है-
( 1 ) तेज बुखार । 
( 2 ) अस्थिर रक्तचाप । 
( 3 ) बहुत ही संवेदनशील त्वचा ।
( 4 ) घातक कैंसर । 
( 5 ) क्षय रोग वाली अस्थि । 
( 6 ) मानसिक रूप से मन्द व्यक्तियों की । 
( 7 ) गर्भवती महिलाएँ । 
( 8 ) गुर्दे व हृदय की समस्याएँ । 
( 9 ) वह व्यक्ति जो कार्डियक पेसमेकर उपयोग करता हो । 
( 10 ) इलाज जिस पर फिट नहीं बैठता ।

No comments:

Post a Comment